परसाद विहारिनि रानी कौ

Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव

Verse 26 of 35

(मूलताल) श्रीबिहारीबिहारिन की री मोपै यह छबि बरनी न जाइ। कुंजमहल में होरी खेलैं जाके अंग अंग रंग चुचाइ॥ [1] तन मन मिले जिले मृदु रस में आनंद उर न समाइ। श्रीहरिदास ललित छवि निरखत सेवत नव नव भाई॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी (मूल) श्री बिहारी बिहारिन की इस छवि को चित्रित नहीं किया जाना चाहिए। कुंजमहल मैं होरी खेल के लिए अंग अंग रंग चुचाई.. [1] तन मन मि जेले मृदु रस मैं आनंद उर एन समाई। श्री हरिदास ललित छवि निरखत सेवत नव नव भाई.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी
परसाद विहारिनि रानी कौपरसाद विहारिनि रानी कौ