आली जुगुलविहार रस
Lalit Kishori Vani — श्री ललित किशोरी देव
Verse 35 of 35
आली जुगुलविहार रस, जिनके सदा आहार।
तिनकी दासी ह्वै रहो, तजिके सोच विचार॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (14)
अली जुगुलविहार रस, जिनका निरंतर आहार। तिनकी दासी ह्वै रहो, ताजिके सोच विचार.. - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, युगल विहार शतक (14)