कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी

Madhury Shata — श्री वंशी अलि

Verse 1 of 13

देख्यो नेही नंदकिसोर। हाइ-हाइ दिन-रात बितावत, निरखत प्यारी ओर॥ [1] अँसुअन धारि ढरति धाराधरि, मारत श्वास झकोर। विछुरनि भरयौ रहत ‘वंशीअलि’, नाहिं कोऊ रौर॥ [2] - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (38) देखो नन्दकिशोर। क्या दिन और क्या रातें बीत गईं, अलिखित प्रिये? [1] अनसुनी धरती, माटी की धरती, धड़कती सांस। विच्छुरानि भरयौ रहत 'वंशीयलि', नहिं कुओ राउर.. [2] - श्री वंशी अली, माधुर्य शत (38)
कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी