(दोहा)

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 26 of 65

(दोहा) सोंह तिहारी मोही अहु, जो मैं कहौं जु राखि। कृपा दृष्टि ही चहत नित, और न उर अभिलाखि॥ (पद) एक मैं कृपा सुदृष्टि चहौं। सोंह तिहारी मोही अहो जीय जो मैं राखि कहौं। जब तुम चितवत मो तन के तन तब सब सुखहिं लहौं। श्रीहरिप्रिया नाउँ तेरे बिन और कछु न चहौं॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज-सुख (44) ॥ दोहा॥ हे स्वामिनीजी! यदि मैं आपसे किंचित मात्र भी कुछ छिपाता हूँ, तो मुझे आपकी ही शपथ है। मैं केवल आपकी करुणाभरी कृपा-दृष्टि का अभिलाषी हूँ; इसके अतिरिक्त मेरे मन में अन्य कोई कामना नहीं है। ॥ पद॥ मैं केवल आपकी कृपा दृष्टि ही चाहता हूँ इसके अतिरिक्त यदि मेरी कुछ और अभिलाषा हो तो मुझे आप की सौगंध है। जब आप मेरी ओर कृपा भरी दृष्टि से देखती हो तो सब प्रकार के सुखों का लाभ मुझको हो जाता है। हे श्री हरि की प्रिया स्वामिनीजु, आपके नाम के बिना मैं और कुछ नहीं चाहता हूँ।
सुखकारी सबके सदा(दोहा)