(दोहा)

Mahavani — श्री हरिव्यास देवाचार्य

Verse 29 of 65

(दोहा) चितवत तुव मुखचन्द्र छबि, परत पलै बिचि आनि। अहो कुँवरी करुनामई, बितवें बरस समान॥ (पद) प्रानन के आधार मेरे। अहो कुँवरी करुनामई स्वामिनि रहौ सदा मो नेरे॥ अन्तर आनि परत पल चितवत बितवत वर्ष घनेरे। श्रीहरिप्रिया यह टेव परी कोउ सूझ न साँझ सबेरे॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (46) (दोहा) हे प्रियाजू! आपके मुख-चंद्र की सुषमा का दर्शन करने में जब मेरी पलकें बाधा डालती हैं, तो वह एक क्षण का अंतराल भी मुझे युगों के समान प्रतीत होता है। (पद) हे मेरे प्राणों की आधार स्वरूपा, हे करुणामयी स्वामिनी जू, आप मेरे सदा अत्यंत निकट रहें। क्योंकि आपको देखने में मेरी पलकें व्यवधान डालती हैं, तो वह क्षणकाल भी मुझको वर्षों के समान व्यतीत होता है।हे श्रीहरि की प्रिया स्वामिनी जू, आपकी रूप माधुरी देखने की मेरी आदत सी पड़ गई है। मुझको इसके अतिरिक्त यह भी पता नहीं रहता कि कब सवेरा होता है और कब साँझ होती है।
राधेजू मेरौ जनम सुधारौ।(दोहा)