रसिक जननि कौ संग मनोहर

Man Shiksha — श्री किशोरी अलि

Verse 4 of 7

वृंदावन बसि, वृंदावन बसि, वृंदावन सुखदाई रे। जहां अखंड विराजत दम्पति, करत केलि मन भाई रे॥ - श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (9) वृन्दावन बसी, वृन्दावन बसी, वृन्दावन सुखदाई रे। जहां अखंड सिंहासन जोड़े, करते हैं केवल मन के भाव.. - श्री किशोरी अली, मन शिक्षा (9)
रसिक जननि कौ संग मनोहररसिक जननि कौ संग मनोहर