रसिक जननि कौ संग मनोहर
Man Shiksha — श्री किशोरी अलि
Verse 5 of 7
वृन्दावन, वृन्दावन, वृन्दावन कहि रे।
वृन्दावन-रज की अब, सरन बेगि गहि रे॥ [1]
भटकै जिन देस देस, वेस जिन लजावै।
कुंजन के कौनें परयौ जुगल क्यों न गावै॥ [2]
भलो बन्यौ दाव यौं ही, आव जिनि गवांवै।
छुटि जैहै तनक मैं तन, पाछैं पछितावै॥ [3]
चतुर तोहि जानिहौं जो, चेति है सबेरौ।
अब ही करि लेहि क्यों न, आपनौं निबेरौ॥ [4]
राखि मन भरोसौ तोहि, पोखिहैं श्रीराधा।
किशोरी दृढ़ चरन सरन, मिटि हैं सब बाधा॥ [5]
- श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (8)
वृन्दावन, वृन्दावन, वृन्दावन कहीं। अब मैं वृन्दावन के राज्य में शरण लूँगा। [1] जो लोग एक देश से दूसरे देश भटकते रहते हैं, जो भटके हुए होते हैं। कुंजन के परायों का गुण क्यों नहीं गाते.. [2] ऐसी दवा भी बनाओगे तो जान से हाथ धो बैठोगे। छोटी जाए तनक मैं तन, पचैं पछितावै..[3] जो चतुर हैं वे ही जानते हैं कि वे चेतन हैं। तुम इसे अभी क्यों नहीं करते, प्रिये? [4] राखी भरोसा मन का, कृपा करो श्री राधा की। किशोरी के अटल चरण, मिट गया सब कुछ उग आया.. [5] - श्री किशोरी अली, मन शिक्षा (8)