मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ

Mohan Mohini — श्री बिंदु जी

Verse 1 of 6

भक्त बनता हूँ मगर अधमों का सिरताज भी। देखकर पाखंड मेरा हंस पड़े ब्रजराज भी॥ [1] कौन मुझसे बढकर पापी होगा इस संसार में। सुन के पापों की कहानी डर गये यमराज भी॥ [2] क्यूं पतित उनसे कहे सरकार तुम तारो हमें। हैं पतितपावन तो रक्खेंगे अपनी लाज भी॥ [3] ‘बिन्दु” दृग के दिल हिलादें क्यों न दीनानाथ का। दर्द दिल भी साथ है औ’ दुखभरी आवाज भी॥ [4] - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी मैं भक्त भी हूं और पीड़ित लोगों का नेता भी। मेरा पाखण्ड देखकर ब्रजराज भी हँस पड़े। [1] इस संसार में मुझसे बढ़कर पापी कौन होगा? पाप की कथा सुनकर यमराज भी भयभीत हो गये। [2] गिरा हुआ मनुष्य उस से क्यों कहे, हे सरकार, तू ही मेरा सहारा है। तुम पतित-पावन हो तो अपनी लाज भी रखोगे.. [3] 'बिन्दु' दीनानाथ के हृदय को क्यों न झकझोरे? दिल में दर्द है और आवाज़ भी उदास है.. [4] - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ