मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ

Mohan Mohini — श्री बिंदु जी

Verse 2 of 6

भजन श्यामसुंदर का करते रहोगे। तो संसार सागर से तरते रहोगे॥ [1] कृपानाथ बेशक मिलेंगे किसी दिन। तो सत्संग पथ से गुजरते रहोगे॥ [2] चढोगे हृदय पर सभी के सदा तुम। जो अभिमान गिरि से उतरते रहोगे॥ [3] न होगा कभी क्लेश मन को तुम्हारे। जो अपनी बड़ाई से डरते रहोगे॥ [4] छलक हीं पड़ेगा दयासिन्धु का दिल। जो दृग ‘बिन्दु’ से रोज भरते रहोगे॥ [5] - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी श्यामसुन्दर के गुण गाते रहेंगे। तो तुम संसार सागर में तैरते रहोगे.. [1] शुभचिंतक कृपानाथ तुम्हें कभी न कभी तो मिलेंगे। इसलिए आप सत्संग के मार्ग पर चलते रहेंगे.. [2] आप सदैव सभी के हृदय में रहेंगे। आप अहंकार के पतन से नीचे आ जायेंगे.. [3] और कभी-कभी आपके मन में परेशानी होगी। जो तुम्हें अपनी बातों से डराते रहेंगे.. [4] दयासिंधु का हृदय चकनाचूर हो जायेगा। जो नित पीता 'बिंदु'.. [5] - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी
मैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँमैं घनश्याम को देखता जा रहा हूँ