जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न
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Verse 1 of 23
जो मन अरुझ्यो रूप हैं, क्यों हू कहत बनैं न।
रसना कैं तो मन नहीं, मन कैं रसना हैं न॥
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)
मन तो अरुज्यो स्वरूप है, मैं यह क्यों कह रहा हूं कि इसकी रचना नहीं करनी चाहिए? वासना क्यों है, मन वहां नहीं है, मन वासना से भरा क्यों है? - श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की आवाज, मनोरथ मंजरी (30)