बड़ौ मन्द अरविन्द सुत
Nanddas Granthavali — श्री नंददास
Verse 23 of 23
जलचर ज्यों जलभीर मै, जानत नाहिन पीर।
विछुरे परै जब नीर तै, सच सचु जानै नीर॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)
जलीय जीव अपनी माँ के समान होता है, उसे कोई कष्ट नहीं होता। जब पराया अदृश्य हो जाता है, तब सत्य निर्मल प्रतीत होता है.. - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (30)