बड़ौ मन्द अरविन्द सुत
Nanddas Granthavali — श्री नंददास
Verse 22 of 23
बड़ौ मन्द अरविन्द सुत, जिहि न प्रेम पहिचान।
पिय मुख देखत दृगन के, पलक लगे बिच आन॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (13)
बदौ मंद अरविन्द सुत, जिहि न प्रेम पहचानिया। पीते पीते अजगर का मुख देखकर पलकें टूट रही हैं.. - श्री नन्ददास, श्री नन्ददास ग्रन्थावली, विरह मंजरी (13) प्रेम तत्त्व की अज्ञानता के कारण सृष्टिकर्ता विधाता (अरविन्द-सुता) निश्चय ही उपहास के पात्र हैं; क्योंकि दर्शन के समय पलकें व्यवहार करती हैं। जब प्रेम से भरी आंखें श्री कृष्ण के मुखारविंद की तरह मिठास पीती हैं तो पलकों के सामने एक विशाल दूरी दिखाई देने लगती है। प्रेमियों की झूठी पलक झपकने का वह क्षण भी युगों की भाँति कठिन और असहाय होता है।