एक ही सिंगार तन एक प्राँन एक मन
Naval Dev Vani — श्री नवल देव
Verse 2 of 2
(कवित्त)
एक ही सिंगार तन एक प्राँन एक मन,
एक ही सरूप कापै परत लखानी है। [1]
एक ही बरन अंग भूषन बसन सुरंग,
एक ही सुभाव प्रेम रंग रस सानी है॥ [2]
एक ही सुदृष्टि सखी नैन सों नैंन जोरें,
एक ही समाज राग रंग सुखदानी है। [3]
नवल निहार दोऊ पटतर कौ न कोऊ,
श्रीबिहारिनिदास किंधौं बिहारिनि रानी है॥ [4]
- श्री नवल देव जी, श्री नवल देव जू की वाणी (8)
(कविता) एक ही श्रृंगार है, एक ही तन है, एक ही आत्मा है, एक ही मन है, एक ही रूप है, हर परत सुन्दर है। [1] एक ही देह है, सुरंग का सौंदर्य, वही सौंदर्य, प्रेम, रंग और स्वाद... [2] वही शुभ दृष्टि, मेरे मित्रों की दृष्टि, वही समाज हर त्वचा को भाता है। [3] नवल निहार दोऊ पातर कौन कू, श्री बिहारिनदास किंधौं बिहारिणी महारानी.. [4] - श्री नवल देव जी, श्री नवल देव जू की वाणी (8)