भजनी क्यों डरिहै उपहासहि
Neh Nagaridas Vani — श्री नागरीदास
Verse 1 of 2
भजनी क्यों डरिहै उपहासहि।
अपनी वस्तु नौहरी काजै, सहै जगत के त्रासहिः॥ [1]
सुहृद सनेही अपनी अपनी, आतम मान करहु वस वासहि।
बेपरवाही व्यास सुवन कौ, बल है नागरीदासहि॥ [2]
- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी
भजनी इतनी हास्यास्पद क्यों है? मेरा लक्ष्य है नौसिखिया बनना, दुनिया की मुसीबतें सहना..[1] मेरी प्यारी और प्यारी आत्मा, मैं अपने दिल में रहता हूँ। बेपरवाही व्यास सुवन कौ, बाला है नागरीदासही.. [2] - श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी के वचन