विहारिणि सर्वोपरि शिरताज
Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी
Verse 31 of 34
श्यामा प्यारी विनय सुनौ एक मेरी॥
भटकत फिरी बहुत गहवर वन, थाह न पाई तेरी।
अब तौ चरण सरन मोहि लींजै, जानि आपनी चेरी॥ [1]
करुणा सागर नाम तिहारो, सत्य करो मम हेरी।
अली माधुरी कौ अपनावो, अब न करो कछु देरी॥ [2]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (1)
प्रिय श्यामा, विनय, मेरी एक बात सुनो.. मैं फिर घने जंगल में खो गया, क्या तुम मुझे नहीं मिली? अब मेरे चरण तुम्हारे हैं, मैं तुम्हारे हृदय को जानता हूं। [1] करुणा सागर नाम तिहारो, सत्य करो मम हेरी। अली माधुरी, किसे अपनाओगे, अब देर मत करो.. [2] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (1)