विहारिणि सर्वोपरि शिरताज
Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी
Verse 30 of 34
श्यामा जी तेरे चरनन की बलिहारी॥ [1]
शीतल सुभग कमल ते कोमल, सुन्दर नष छवि न्यारी।
जिन को सेवत है मनमोहन, अद्भुत खेल खिलारी॥ [2]
तिन की महिमा विपनराज छवि, तीन लोक उजयारी।
रसिक जनन विसराम निरन्तर, निसदिन रहत निहारी॥ [3]
श्री यमुना के तट कुंजन में, विहरत संग सहचारी।
अली माधुरी के सरबस धन, गौर वरन सुखकारी॥ [4]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, प्रातः स्मरामि (9)
श्यामा जी आपके चरणों की बलिहारी.. [1] कमल की कोमल, सुंदर और मनोहर छवि अद्वितीय है। जो भी सेवा करे, अद्भुत खिलाड़ी मनमोहन। [2] तीन विपनराज छवि की महिमा, तीन लोक की ज्योति। मैं रसिक जनन विश्राम को निरंतर, प्रतिदिन देखता रहता हूं। [3] कुंजन पुरुष, श्रीयमुना के तत्त, विहारत सच्चर। अली माधुरी के सरबस धन, गौर वरण सुखकारी.. [4] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी, प्रथ स्मरामी (9)