विहारिणि सर्वोपरि शिरताज
Nikunj Keli Madhuri — श्री अली माधुरी
Verse 33 of 34
तुम बिन कासौं विनय कहौं।
श्यामा प्यारी सुनौ वीनती; कहां लग विरह सहौं॥ [1]
ऐसो को समरथ जग माहीं जाकी शरन लहौं।
सुन्दर श्याम सिरोमन कहै मुख राधे चरन गहौं॥ [2]
इन विन और न कोई दीषत जाकी बांह रहौं।
अली माधुरी को अपनावो और न कछु चहौं॥ [3]
- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (2)
आप बिना किसी हिचकिचाहट के विनम्रता से बात करते हैं. प्रिय श्यामा, मेरी विनती सुनो; कहाँ विरह सहूँ.. [1] ऐसे लोक में जाकर शरण लूँ क्या? सुंदर श्याम सिरोमन कहते हैं श्री राधे के चरणों में मेरा प्रणाम है. [2] मैं किसी के बिना पराया न बनूँ। मुझे अली माधुरी के लिए और कुछ नहीं चाहिए.. [3] - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुंज केली माधुरी, श्यामा जू की विनय पत्रिका (2)