महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप

Nikunj Ras Vallari — हित गोपाल दास

Verse 81 of 108

(कवित्त) महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप, अंकहि विराजैं प्यारी प्रिय निज वृन्दावन।[1] मनिमय भूमि जाकी उपमा कौं नहीं ताकी, याकी बात बाँकी जहँ बिहरत दोऊ जन॥ [2] सेवाकुंज-मण्डल पुलिन वंशीवट तट, जमुना निकट सोहैं प्रेम बनितान गण। [3] दीये गलबाँही सखीमण्डल के माँहि ‘चन्द्र- हित’ बलि जाँहीं वारे प्रान-तन-मन-धन॥ [4] - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृंदावन प्रकाश माला (कविता) महाछवि राजेन कोटि भानु लिखि लाजैन रूप, अनकहि विराजैन प्रिय प्रिय निज वृन्दावन। [1] मणिमय भूमि जाकी उपमा कौन नहीं ताकी, याकी बट बांकी जहां बिहारत दोउ जान.. [2] सेवाकुंज-मंडल पुलिन वंशीवट तत, जमुना नियर सोहन प्रेम बनितन गण। [3] जिन्होंने सखीमंडल के 'चंद्र-हित' के लिए सिर झुकाया और अपने जीवन, तन, मन और धन का बलिदान दिया.. [4] - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, वृन्दावन प्रकाश माला।
राधे आन पड़ो तेरे द्वारमन मोहन मन मोहनी, सहज ही स्यामल गौर।