सुहागिनि राधा रानी

Padavali —

Verse 7 of 9

(राग बिहाग) सुहागिनि राधा रानी। [1] स्यामसुंदर ब्रजराज-दुलारो जाकें बस अभिमानी। [2] सोभा को सिर छत्र बिराजै बृंदाबन रजधानी। [3] जीति लियौ कियौ रूप-पपीहा आनँदघन रसदानी॥ [4] - श्री आनन्दघन जी, पदावली (65) (राग बिहागा) सुहागिनी राधा रानी। [1] स्यामसुन्दर ब्रजराज-दुलारो जकन केवल अहंकारी हैं। [2] सोभा को सर छत्र बिराजै बृंदाबन राजधानी। [3] जितनी लियौ कियौ रूप-पपीहा आनंदघन रसदानी.. [4] - श्री आनंदघन जी, पदावली (65)
राधे रानी ! तुम को मेरी लाजकिशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी