वृंदावन बंसीवट जमुनातट बंसी रट

Padavali —

Verse 9 of 9

(राग जै-जैवंती) वृंदावन बंसीवट जमुना-तट बंसी रट, रास में रसिक प्यारो खेल रच्यौ वन में। [1] राधा-माधो कर जोरैं, रवि-ससि होत भौरें, मंडल में निरतत दोऊ सरस सघन में॥ [2] मधुर मृदंग बाजै, मुरली की धुनि गाजै, सुधि न रही री कछु, सुर, मुनि, जन में॥ [3] ‘नंददास’ प्रभु प्यारो, रूप-उजियारो अति, कृष्ण-क्रीड़ा देखि भये थकित जन मन में॥ [4] - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (122) (राग जय-जयवंती) वृन्दावन बंसीवत जमुना-तत् बंसी रत, रस पुरुष रसिक प्यारो खेल रचयौ वन पुरुष। [1] राधा-माधो गा रहे हैं, रवि-सस्सी खिल रहे हैं, जोड़े सजीव वातावरण में घेरे में नृत्य कर रहे हैं.. [2] मधुर मृदंग बज रही है, बांसुरी बज रही है, सुधि री कछू, सूर, मुनि लोगों के मन में बस रहे हैं.. [3] 'नंददास' प्रिय प्रभु, इतना सौंदर्य और प्रकाश है, लोग कृष्ण की लीला देखकर थक गए हैं.. [4] - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, पदावली (122)
किशोरी मैं तो भली बुरी सो तेरी