मो मन ऐसी अटक परी

Pitambar Dev Vani — श्री पीताम्बर देव

Verse 3 of 4

(राग बिलावल) मो मन ऐसी अटक परी। विपिन बिहार निहारत सहचरि मूरति हिए अरी॥ [1] जग के काज अकाज न सूझत प्रलय समान घरी। 'पीताम्बर' देखे विन तलफत ज्यों जल बिन मछरी॥ [2] - श्री पीताम्बर देव जी, श्री पीताम्बर देव जू की वाणी (15) (राग बिलावाला) मेरा मन बहुत अटक गया है। विपीन बिहार देहात साथी मुराती..[1] दुनिया के काम समझ में नहीं आते, प्रलय आ रही है। 'पीताम्बर' देखिये, मछली बिन पानी भी उतना ही बुरा है.. [2] - श्री पीताम्बर देव जी, श्री पीताम्बर देव जू की वाणी (15)
जय राधा, जय राधानित्य सिद्ध श्री स्वामिनी