प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं

Prem Vatika — श्री रसखान

Verse 30 of 41

प्रेम हरि को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप। एक होई द्वै यों लसैं, ज्यौं सूरज अरु धूप॥ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (24) प्रेम हरा रूप है, तुम प्रेम का हरा रूप हो। जैसे सूरज और धूप दो मिलकर एक हो जाते हैं.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (24)
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिंप्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं