प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 31 of 41
प्रेम निकेतन श्रीबनहि, आइ गोबर्धन धाम।
लह्यौ सरन चित चाहिकै, जुगल सरूप ललाम॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (49)
प्रेम निकेतन श्रीबांहि, हे गोबर्धन धाम। लह्यौ सरन चित चाहिकै, जुगल सरूप ललाम.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (49)