प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं

Prem Vatika — श्री रसखान

Verse 39 of 41

स्वारथमूल असुद्ध त्यों, सुद्ध स्वभावऽनुकूल। नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल॥ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41) मूल ध्वनि अशुद्ध होते हुए भी शुद्ध प्रकृति के अनुरूप है। नारदादि प्रस्तार कारि, कियौ जाहि को तूल.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41)
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिंप्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं