ऐसौ प्रेम न कहूँ ‘ध्रुव’, है वृंदावन माहिं
Priti Chauvani — श्री ध्रुवदास
Verse 2 of 2
रहन देत नहिं और रस, यहै प्रेम की टेक।
याको सहज सुभाव यह, करत दोइ ते एक॥
- श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवनी (12)
अब कोई रस नहीं बचा, यहीं प्रेम का विश्राम है। याको सहज सुभाव ये, करत दोई ते एक.. - श्री ध्रुवदास, प्रीति चौवानी (12)