लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि
Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 108 of 124
राधाकेलि कलासु साक्षिणि कदा वृन्दावने पावने, वत्स्यामि स्फुटमुज्वलाद्भुत रसे प्रेमैक-मत्ताकृति:।
तेजो-रूप निकुञ्ज एव कलयन्नेत्रादि पिण्डस्थितं, ता दृक्स्वो चित दिव्य कोमल वपुः स्वीयं समालोकये॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (266)
राधाकेलि कलासु सक्षिणी कड़ा वृन्दावन पावने, वत्स्यामि स्फुत्मुज्जवलाद्भूत रसे प्रेमिका-मत्तकृति:। तेजो-रूप निकुंज एवं कल्याणनेत्रादि पिण्डस्थिस्तान, ता द्रिकस्वो चित दिव्य कोमल वपुः सवियं समालोके। - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (266)