(कवित्त)
Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 115 of 124
(कवित्त)
गिनत बनै ना अघ अगनित अपार सोऊ,
एक बार राधा नाम मुख सौं उचारै जो।
सोचत हिय बार बार मोहन मन अति उदार,
या को कहा दीजै याकी पटतर अनुसारै जो॥ [1]
प्यारी नाम अमृत रस प्यारौ सुनि विवस होत,
धन्य धन्य सोई अति हित सौं पुकारै जो।
ताकी महिमा की सीम परसि सकै जो कौन,
ललित लड़ैती पद सेवा उर धारै जो॥ [2]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (154)
(कविता) मठ बनि न अघ अनगिनत अनगिनत सुओ, एक बार कहा राधा नाम एक लाख। मैं बार-बार सोचता हूँ कि मोहन का हृदय कितना उदार है, या यूँ कहें कि मैं ही हूँ जो मेरे पीछे चलता है.. [1] प्रिय नाम, अमृत का अमृत, प्रिय सुनो विश्वास, धन्य धन्य नींद, जो बड़े चाव से बुलाती है। तो जो महिमा का पारसी सेवक है, जो ललित लड़ैती पद की सेवा में है, जो सेवा में है.. [2] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (154)