(कवित्त)

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 57 of 124

(कवित्त) कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी विषय वार्ता ताकौं भूल विसरायौ है। [1] मुक्ति आदि मार्ग बहु वेद श्रुति गाये सोउ मोकौं न भाये या तें हियरा डरायौ है॥ [2] परब्रह्म ध्यान रति रहत शुकादि नित कहूँ साँच-साँच सोऊ चित नाहिं आयौ है। [3] मैं तो श्रीराधा पद कंज दुःखगंजन रस रज की मन रंजन मन मंजन करायौ है॥ [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (83) (कविता) कोटि कोटि नरकादिक तिनहु सौं निन्दा, ऐसा विषय, तुम बात करना भूल गये। [1] मुक्ति आदि पथ, बहु वेद श्रुति गये सौ मोकौन न भये या तेन हियरा डरयौ है.. [2] परब्रह्म ध्यान रति रहत शुकादि नित कहूं सांच-सांच सुओ चित न आयु है। [3].
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहिलोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि