लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 88 of 124

परस्परं प्रेमरसे निमग्नमशेषसंमोहनरूपकेलि। वृन्दावनान्तर्नवकुंजगेहे तन्नीलपीतं मिथुनं चकास्ति॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (196) सप्तरा प्रेमरस निमग्नम् शेष समाहं रूप केलि। वृन्दावनान्तरनवकुंजगेहे तनिलापित्ना मिथुन चकस्ति।।- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (196)
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