राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 1 of 51
आजु हौं गई ही बीर सहज निकुञ्जन में,
कौतुक बिलोकि तहां सब सुखदानी के। [1]
कहत बने न मोपे अचरज बात हठी,
कहि कहि हारे मुख चार वेद बानी के॥ [2]
श्रवन सुनै न मानै आंखिन दिखाऊँ तोहि,
चलि दुर मेरे साथ चरित गुमानी के। [3]
लूटै सुख मौटै करै मनुहार कोटै बैठे,
पायन पलोटै लाल राधा महारानी के॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (78)
मैं एक अजनबी हूं, मैं एक साधारण व्यक्ति हूं, एक सनकी हूं, वहां की सभी सुखद जगहों से अलग हूं। [1] जहां हाथी अचंभा बन गया, जहां खरगोश के मुख से चारों वेद रचे गए… [2] श्रवण, सुनै, नाई, आंखिन दिखौं तोही, चरित्र के अभिमान के कारण मेरे साथ चले गये। [3] सुख लूटना, मरना, रिझाना, बैठना, लाल राधा महारानी के चरण सहलाना.. [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (78)