राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 2 of 51
आलसी हौं क्रूर हौं कपूत भांति भांतिन को,
और न उपाय मेरे ध्वाई मोहि कान्ह की। [1]
करुना करोई हिये आपनौई जान ‘हठी’,
तें तौ प्रानप्यारी सदा करुनानिधान की॥ [2]
दीनन की पाल लोकपाल दयासिंधु तोकौं,
ध्यावत गुपाल जिन दावानल पान की। [3]
सोसै नहीं मन मेरो दोसै नहीं काम राखे,
तेरेई भरोसै यह बेटी वृषभान की॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (93)
मैं हर तरह से आलसी, क्रूर, मूर्ख हूं और मेरे प्रलोभनों का कोई समाधान नहीं है। [1] अपने प्रिय 'हाथी' पर दया करो, तुम सदा दयालु हो.. [2] लोकपाल सखा दयासिंधु दीनन, ध्यावत गुपाल, वन में वही। [3] न प्यार, न प्यार मुझसे, न प्यार, इस वृषभान की बेटी को तुझ पर भरोसा.. [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (93)