गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 42 of 51
(कवित्त)
गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं,
पसु कीजै महाराज नन्द के बगर कौ। [1]
नर कौन? तौन, जौन ‘राधे-राधे' नाम रटै,
तट कीजै वर कूल कालिंदी कगर कौ॥ [2]
इतने पै जोई कछु कीजिए कुँवर कान्ह,
राखिए न आन फेर ‘हठी’ के झगर कौ। [3]
गोपी-पद-पंकज-राग कीजै महाराज!
तृन कीजै रावरेई गोकुलनगर कौ॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)
(कविता) गाय तो गाय है, मोर तो सायरन है, मवेशी तो महाराज नंद के संकट हैं। [1] मनुष्य कौन है? 'राधे-राधे' नाम याद आते ही आपका परिवार कालिंदी के कगार पर क्यों आ जाता है? [2] ऐसे में कुंवारे को कुछ क्यों नहीं कहते, 'हाथी' के पास क्यों नहीं लौट आते। [3] गोपी-पद-पंकज-राग किजै महाराज! त्रिन किजै रावरि गोकुलनगर कौ.. [4] - श्री हाथी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)