अति अलवेली भाँति सौं लई मुरलिका हाथ
Radhika Maharasa — श्री वंशी अलि
Verse 6 of 6
तुही एक राधा कुँवर, दृग दरशत नहिं और।
यहै जान हम भजति हैं, अहो रसिक सिरमौर॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (6)
तू ही राधा कुँवर है, दूजा न कोय। याहि जन हम भजती है, अहो रसिक सिरमौर.. - श्री वंशी अली, श्री राधिका महारस, दोहा (6)