प्रेम के हिंडोरे बलि
Rasik Jivani — श्री मनोहर दास
Verse 1 of 2
प्रनऊं वे श्री रसिक अनन्य।
जिनके जुगल किशोर हृदै में, सुपन न कवहूँ आवति अन्य॥ [1]
वसत निरंतर तजति न पल छिन, प्रान सजीवन वृन्दारण्य।
गावति सुनत चरित्रनि मोहन, मानत सुख यों रूप अभिन्न॥ [2]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (4)
सादर, श्री रसिक और अन्य। जिनके जुगल किशोर हृदय पुरुष, सुपन न कवहुँ अवति अन्य। [1] अविरल प्रवाह है, कोई क्षण नहीं खोता, वृन्दारण्य में जीवन जीवंत है। गावति सुनत चरित्राणि मोहन, मानत सुख योन रूप अभिनव.. [2] - श्री मनोहर दास, रोमांटिक जीवनी (4)