प्रेम के हिंडोरे बलि

Rasik Jivani — श्री मनोहर दास

Verse 2 of 2

(कवित्त) प्रेम के हिंडोरे बलि झूलति हैं प्रिया प्रिय, नील पीत बागे बने सोभा उछरत है। [1] बोलनि हँसनि गान एक रस रमकि तीन, मान सों रमकि झोटा स्वास न भरत है॥ [2] भौंह की मरोर में अनंग अंग पावैं कोर, बोरि बोरि रंग अङ्ग अंगनि धरत हैं। [3] राधिकारमण भारि 'मनोहर' चह चारी, लोइनि चतुर चारि खंजन लरत हैं॥ [4] - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (109) (कविता) प्रिया के झुमके प्रेम के झुमकों पर झूल रहे हैं, प्रिया के प्रियतम, नीले और छिद्रित कपड़े से बना सौंदर्य तैर रहा है। [1] बोलानि हंसनि गण राम का सार है, राम के पुत्र का मन भारत की झूठी आत्मा है.. [2] भौंहों के कोने पर हवा के हिस्से, रंगों के बोरे, पृथ्वी के हिस्से हैं। [3] राधिकामन भारी 'मनोहर' चाह चारी, लोइनी चतुर चारी खंजन लरत है.. [4] - श्री मनोहर दास, रोमांटिक जीवनी (109)
प्रेम के हिंडोरे बलि