वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 13 of 16

रे मन, झूठी जग की प्रीत। नेह लगा राधावल्लभ सौं, जो है साँचौ मीत॥ [1] ना कोई बेटा ना कोई नाती, मतलब की है प्रीत। क्यों खोयौ माया के भ्रम में, तज झूठी परतीत॥ [2] छोड़ जगत सौं मोह अरे मन, गा मोहन के गीत। साँचौ नाम एक राधे कौ, होय हमेशा जीत॥ [3] - रसिक वाणी हे मन, मिथ्या जगत् में आसक्ति। प्रिय राधावल्लभ सौं, जो सांचौ मिट.. [1] न कोई पूत, न कोई पौत्र, मेरा मतलब है प्रिय। तुम माया के भ्रम में क्यों खोये हो, संसार मिथ्या है। [2] मन मोहन का गीत गाओ जो बड़े प्रेम से संसार छोड़ गया। सांचो नाम एक राधे कोउ, होय सदा जीत.. [3] - रसिक वाणी [लक्ष्मण प्रसाद गौड़, वृन्दावन]
वसिये श्री वृन्दावन धामतनक हँस हेरो मेरी ओर