वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 12 of 16

पावन वृन्दा विपिन की, महिमा कही न जाय। जाकी रज पावन परसि, पापी जन तरि जाय॥ [1] पापी जन तरि जाय, नेकहू कष्ट न पावे। राधेश्याम सुनाम रटि, धाम श्रीहरि कौ पावे॥ [2] सन्त सकल संसार में, वृन्दावन मन भावन। साधु-संग सतसंग सों, बने अपावन पावन॥ [3] - रसिक वाणी पवन वृन्दा विपिन की महिमा, नहीं महिमा। जाकी राज पवन पारसी, पापी जन तारी जय.. [1] पापी जन तारी जय, धर्मात्मा को कष्ट न हो। राधेश्याम सुनाम रति, धाम श्रीहरि कौ पावे.. [2] संत सकल संसार पुरुष, वृन्दावन मन भवन। संतों के सत्संग से पुत्र पवित्र हो जाता है.. [3] - रसिक वाणी
वसिये श्री वृन्दावन धामवसिये श्री वृन्दावन धाम