वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 16 of 16

यह रस ब्रह्म लोक पातालै अवनिहूँ दरसत नाहीं। या रस कौं कमलापुर हूँ के तरसत हैं मन माँहीं॥ [1] सो रस रासेश्वरी की कृपा ते प्रेमीजन अवगाहीं। ‘रसिक’ लख्यौ जो सुख वृन्दावन तीन लोक सो नाहीं॥ [2] - ब्रज के सवैया यः रस ब्रह्म लोक पातालै अवनिहुँ दरसत् नाहीं। अथवा मन में कमलापुर के रस की अभिलाषा है.. [1] अत: रस रसेश्वरी की कृपा से प्रेमी का उद्धार हो जाता है। आप 'रसिक' में जिस सुख की बात लिखते हैं, वह वृन्दावन या तीनों लोक तक नहीं पहुँचेगा.. [2] -ब्रज के सवैया।
वसिये श्री वृन्दावन धाम