काहू की आस न त्रास करै

Saras Dev Vani — श्री सरस देव

Verse 5 of 5

(सवैया) काहू की आस न त्रास करै, पकरै अपने व्रत को निरधारो। [1] लोग लिवास लियें मनु लाखकु, लालचि जनन काज विगारौ॥ [2] धृग जीवन दै धर्मै धन आनत, मानत धन्य कियैं मुँह कारो। [3] 'सरस' सुसार बिहार अधार, अनन्य जनन्य को पैंडोई न्यारो॥ [4] - श्री सरस देव जु, श्री सरस देव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (14) (सवैया) मैं क्यों इतना कष्ट उठाऊं, मेरा व्रत निराधार कर दो। [1] बच्चे पैदा करने के लालच में लोग अधिक समय तक जीवित रहते हैं। [3] 'सरस' सुसर बिहार आधार, अन्य माता को दरदोई न्यारो.. [4] - श्री सरस देव जू, श्री सरस देव जू की वाणी, सिद्धांतों के पद (14)
राजति नव निकुंज नव जोरी