निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली
Sevak Vani —
Verse 4 of 4
श्रीहरिवंश सु रीति सुनाऊँ, श्यामा-श्याम एक सँग गाऊँ। [1]
छिन इक कबहुँ न अन्तर होई, प्रान सु एक देह हैं दोई॥ [2]
राधा संग बिना नहीं श्याम, श्याम बिना नहिं राधा नाम। [3]
छिन-छिन प्रति आराधत रहहीं, राधा नाम श्याम तब कहहीं॥ [4]
ललितादिकनि संग सचु पावैं, श्रीहरिवंश सुरत-रति गावैं॥ [5]
- श्री दामोदरदास (सेवक जी), श्री सेवक वाणी (4.7)
आइए परंपरा के अनुसार श्री हरिवंश जी को सुनें और मिलकर श्याम-श्याम गाएं। [1] दोनों में कोई अंतर नहीं, जीवन एक शरीर है.. [2] श्याम के बिना राधा नाम नहीं, राधा के बिना श्याम नाम नहीं। [3] छिन-छिन प्रति आराधना रहिन, राधा नाम श्याम तबहि कहिन.. [4] ललितादिकानि संग सच्चु पावैन, श्री हरिवंश सुरता-रति गैवन.. [5] - श्री दामोदरदास (सेवक जी), श्री सेवक वाणी (4.7)