निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली
Sevak Vani —
Verse 3 of 4
निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली।
आनंद नैन सुढार, यह जू कृपा हरिवंश की।
- श्री सेवक जी (दामोदर दास) - श्री सेवक वाणी
निरखत नित्य विहार, पुलकित तन रोमावली। हरिवंश की कृपा से आनंद की आँखें अच्छी हो गयीं। - श्री सेवक जी (दामोदर दास) - आप श्री सेवक वाणी नित्य विहार के दर्शन कर रहे हैं, आपका पूरा शरीर आनंद से भर गया है, आप रोमांचित हैं, आपकी आंखों से खुशी के आंसू बह रहे हैं, यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु की सर्वव्यापी कृपा है।