हे वृषभानुराज-नन्दिनि

Shodash Gita — श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार

Verse 1 of 2

दोउ चकोर, दोउ चंद्रमा, दोउ अलि, पंकज दोउ। दोउ चातक, दोउ मेघ प्रिय, दोउ मछरी, जल दोउ॥ [1] आस्रय - आलंबन दोउ, विषयालंबन दोउ। प्रेमी प्रेमास्पद दोउ, तत्सुख - सुखिया दोउ॥ [2] लीला आस्वादन निरत महाभाव - रसराज। वितरत रस दोउ दुहुन कौं, रचि बिचित्र सुठि साज॥ [3] सहित बिरोधी धर्म-गुन जुगपत नित्य अनंत। बचनातीत अचिंत्य अति, सुषमामय श्रीमंत॥ [4] श्रीराधा - माधव - चरन बंदौं बारंबार। एक तत्त्व दो तनु धरें, नित रस - पारावार॥ [5] - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, पद-रत्नाकर, षोडश गीत (1) दो चकोर, दो चंद्र, दो अली, दो पंकज। दोउ चातक, दोउ मेघ प्रिया, दोउ मचरी, जल दोउ.. [1] आश्रय - आलनबन दोउ, विषायालनबन दोउ। प्रेमी प्रेमस्पद दोउ, तत्सुख - सुखिया दोउ.. [2] लीला असवदन निरत महाभाव - रसराज। जूस बांटने और दूध पिलाने वालों ने बनाए अजीब सूती आभूषण..[3] इसके साथ ही जुगपत नित्य अनात, जो धर्म और सदाचार के विपरीत है। बचन्तित अकल्पनीय अति, सुषमामय श्रीमन्त..[4] बारम्बार श्रीराधा-माधव-चरण बन्दाऊँ। एक तत्व, दो तनु, नित्य रस - पारावार.. [5] - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, पद-रत्नाकर, षोडश गीत (1)
हे वृषभानुराज-नन्दिनि