हे वृषभानुराज-नन्दिनि

Shodash Gita — श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार

Verse 2 of 2

(राग परज, तीन ताल) हे वृषभानुराज-नन्दिनि ! हे अतुल प्रेम-रस-सुधा-निधान ! गाय चराता वन-वन भटकूँ, क्या समझूँ मैं प्रेम विधान॥ [1] ग्वाल-बालकों के सँग डोलूँ, खेलूँ सदा गँवारू खेल। प्रेम-सुधा सरिता तुमसे मुझ तप्त धूलका कैसा मेल॥ [2] तुम स्वामिनि अनुरागिणि ! जब देती हो प्रेमभरे दर्शन। तब अति सुख पाता मैं, मुझपर बढ़ता अमित तुम्हारा ऋण॥ [3] कैसे ऋणका शोध करूँ मैं, नित्य प्रेम-धनका कंगाल। तुम्हीं दया कर प्रेमदान दे, मुझको करती रहो निहाल॥ [4] - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, षोडश गीत (5) (राग परज, तीन ताल) हे वृषभानुराज-नंदिनी! वह शाश्वत प्रेम-रस-शुद्ध-आधार! वन में चरता पथिक, क्या समझूँ प्रेम का नियम.. [1] ग्वालों के साथ खेलना सदा क्रूर खेल है। प्रेमा-सुधा सरिता, तेरा और मेरा क्या मेल, मेरी तपती धूल.. [2] तुम मेरी स्वामिनी की प्रियतमा हो! जब तुम प्रेममय दर्शन देते हो। तब मुझे परम सुख का ज्ञान होगा, तुम्हारा प्रेम मुझ पर उमड़ पड़ेगा। [3] मुझे प्यार कैसे मिलेगा, मुझे हर दिन प्यार और पैसा चाहिए। मुझ पर दया करो और मुझे प्यार करो, मुझे खुश रखो.. [4] - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, षोडश गीत (5)
हे वृषभानुराज-नन्दिनि