जय जय श्री ललिता ललित
Shri Lalita Mngala — श्री वंशी अलि
Verse 2 of 5
जय जय श्री ललिता ललित जुगल आनन्दिनी।
जीवन प्रान समान सु कीरति नन्दिनी॥ [1]
दम्पत्ति करि गति रति मति जुग धन स्वामिनी।
निज सम्पति नित विलसति गुन-अभिरामिनी॥ [2]
अभिराम गुन बरनत थके मति कवि कथा कैसे लहैं।
जाके प्रसाद प्रभाव लखि, जिय लाल हू मूकै रहैं॥ [3]
सेवा विविध विधि चातुरी, गुन कह सकति नहिं राधिका।
दासी जननि नित पोषिणी, प्रिय सहचरी सुख साधिका॥ [4]
- श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5)
जय जय श्री ललिता ललित जुगल आनंदिनी। जीवन प्राण सम सु किरति नंदिनी।।[1] युगल करि गति रति मति जुग धन स्वामिनी। अपनी संपत्ति, दैनिक विलासिता, पुण्य-सुख। [2] एक कवि खुशी के गुणों के बारे में कहानी कैसे लिख सकता है और जब वह थका हुआ हो तब नहीं? जेके प्रसाद प्रभाव लखी, जिया लाल हूं मुकै रहैं.. [3] सेवा, विविध विधि, चतुराई, गुण नहीं कहाये जा सकते राधिका। दासी माँ नित्य, प्रिय साथी, सुख की खोजी.. [4] - श्री वंशी अली, श्री ललिता मंगल (5)