महा रूप रस माधुरी, दंपति केलि विलास

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 30 of 35

ललित लाडिली लाल कैं, कंठ रही लपटाइ। कल कुंदन सौं नीलमनि, मनो दामिनी घन छाइ॥ - श्री रूप सखी, श्रिंगार रस के दोहे (57) ललित लाड़िली लाल कैं, गला धड़क रहा है। कल के कुन्दन सौ नीलमणि हैं, मनो दामिनी के छः मन हैं... - श्री रूप सखी के दोहे, शृंगार रस (57)
महा रूप रस माधुरी, दंपति केलि विलासमहा रूप रस माधुरी, दंपति केलि विलास