कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 32 of 35

पिय-प्यारी निज केलि मैं, तन मन मिलि अभिराम। अंग-अंग सोभा सरस, कुंज-महल निज धाम॥ - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15) प्यारे-प्यारे, मैं अकेला हूँ, तन-मन से मस्त हूँ। अंग-अंग सुन्दर है, कुंजा-महल मेरा निज निवास है.. - श्री रूप सखी के दोहे, शृंगार रस (15)
महा रूप रस माधुरी, दंपति केलि विलासकुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल