कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 33 of 35

सरद चंद प्यारी बदन, प्रीतम नैंन चकोर। हरषि रूप निरखत रहैं, इकटक ये ही ओर॥ - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (27) सरद चंद प्यारी बदन, प्रीतम नैनन चकोर। हरषि का रूप निराला है, यहाँ तक कि... - श्री रूप सखी, शृंगार रस के दोहे (27)
कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लालकुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल