राग द्वेष हमरे नहीं

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 46 of 102

राग द्वेष हमरे नहीं, नहीं देह अभिमान। नित्त प्रिया मिलि भाव सों, ललित सु रसिक सुजान॥ - श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (309) हमें न राग है, न द्वेष है, न देह-अभिमान है। नित्त प्रिया मिलि भव पुत्र, ललित सु रसिक सुजान.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (309)
नामी नाम न भावईराग-द्वेष हमरे नहीं