आज सखि निरख रूप भरि नैन

Siddhanta Pada —

Verse 62 of 63

(राग विहागरौ) तिहारौ तौ परयौ है मान को सुभाव। तुम्हरी खोट के इनकी, कहियत कौन करे यह न्याव॥ [1] ये तो तिहारे रूप रस लोभी, मुख जोवत दिन जाव। छिन में रस बेरस करि डारत, को पकरैं कर बाव॥ [2] समझि देख राधे मन माँही, बिन पानी की नाव। श्री रसिकबिहारी रस बस, कीनें अपनें अपनें दाव॥ [3] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (11) (राग विहागरौ) तिहारौ तौ परयौ है मन को सुभाव। उन्हें आपकी गलतियों के बारे में कौन बता सकता है? [1] ये तुम्हारे जैसे लालची लोग हैं, दिन-रात बातें करते रहते हैं। मन का सार छीन लो, डरा दो, जल का आलिंगन करा दो.. [2] समझ लो मन जल बिन असहाय है, नाव है। श्री रसिकबिहारी रस बस, किनेन अपानेन अपानेन दाव.. [3] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के सिद्धांत (11)
ताके मुख की हौं बलि जाउँ।वनराज हमारे प्यारे हैं।