सिद्धान्त के पद
Siddhanta Pada
· 63 verses · Braj
- 1. (कवित्त)
- 2. अब जिन करो अबार लड़ैती जू, मोरी नवरिया अटकी।
- 3. बैठत उठत चलत, श्रीकुंजबिहारी की जिकरि।
- 4. (सवैया)
- 5. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 6. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 7. भजि लै कुंज बिहारिनि बाल।
- 8. बिहारिनी संग निरंतर मेरें।
- 9. चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर, विपिन विनोद विलोकि हिया। [1]
- 10. दिन अथयौ संध्या भई, बोलन लागे मोर।
- 11. हमारौ मेल मिलाप है तो सों प्यारी।
- 12. हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें।
- 13. हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें
- 14. पौंढे माई लालन गिरिवरधारी
- 15. कुंज महल रंग हो हो होरी
- 16. जै जै श्रीबनराज हमारे
- 17. जै जै बिपिन बिहारी जू।
- 18. बिहारी जू है तुम लौ मेरी दौर
- 19. जे श्रीराधा चरन उपासी
- 20. दोऊ राजत स्यामा स्याम
- 21. जिकरि फ़िकरि सब छाँड़ि कै, ललित केली गुन गाव।
- 22. कहा त्रिलोकी जस किये, कहा त्रिलोकी दान।
- 23. पौंढे माई लालन गिरिवरधारी
- 24. कर्म धर्म और ज्ञान विज्ञान भक्ति न आन हृदै में आनौं।
- 25. को सरि करै हमारी राधा।
- 26. कुँवरि किशोरी राधे सुख की रासि।
- 27. लडैती जू को महल महा सुखरासी।
- 28. लड़ैती मेरी प्रानजीवन धन प्यारी।
- 29. लड़ैती तेरे चरण महा सुखदाई।
- 30. लडैती तेरी कृपा कहिय न जाइ।
- 31. ललिता बिनु क्यों राधा पैयेयै।
- 32. (सवैया)
- 33. मेरे प्रान जीवन धन राधे।
- 34. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 35. मो निर्धन की ललिता संपति।
- 36. मोहि भरोसौ स्वामी जी को।
- 37. नैंन बिहारी रूप निरखि, रसन बिहारी नाम।
- 38. नित्यविहार सों करि प्रीति
- 39. नित्य विहार निरंतर मेरो।
- 40. नृपति निकुंज विहारनि रानी।
- 41. प्रीतम कुंवरि चरन बिनु को है।
- 42. प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै।
- 43. प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है।
- 44. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 45. राजा परजा बादशाह, सब कोउ आवै जाय।
- 46. (सवैया)
- 47. हम बालक तुम माय हमारी
- 48. सब ही संत हैं रस भरे, सब ही रस की खानि।
- 49. साधो भाई ऐसौ महल हमारौ।
- 50. साधु साधु सब एक हैं, ठाकुर ठाकुर एक।
- 51. सहचरि करै सोइ मोइ भावै, सहचरि मो मन ढारि ढरत है।
- 52. सखी लालन को पयोष, प्रिया-पद-रस प्याइ।
- 53. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 54. श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै।
- 55. श्री ललिता सिखवत रस परिकर की ॥
- 56. श्री वृन्दावन चन्द्र जू, महाप्रेम-सुख दानि।
- 57. श्री वृंदावन में परि रहै, देखि बिहारी रूप।
- 58. सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै ।
- 59. श्री वृन्दावन रानी साहिबनी।
- 60. सुनो जी कानैं नूपूररो झनकार।
- 61. ताके मुख की हौं बलि जाउँ।
- 62. आज सखि निरख रूप भरि नैन
- 63. वनराज हमारे प्यारे हैं।